अपनी बात की शुरुआत कहां से करूं समझ नहीं आ रहा। उस चंबल की घाटी से, जहां मैं पैदा हुई और जहां के बारे में ढ़ेरों किंवदंतियां प्रसिद्ध हैं। जहां डाकू पैदा होते हैं या फिर तिग्मांशू धूलिया की फिल्म ‘पान सिंह तोमर’ के मुख्य किरदार के मुताबिक बागी पैदा होते हैं। जहां दिन में भी जाने में डर लगता है या फिर देश की राजधानी दिल्ली से, जहां आए चार साल हो चुके हैं और जहां की जिंदगी की आदत हो गई है। जब दिल्ली में सरेआम लुट रही नारी की अस्मिता और दिन-दहाड़े लूट, कत्ल के बारे में सुनती हूं, तो सोचने को विवश हो जाती हूं कि कौन ज्यादा बीहड़ है दिल्ली या फिर चंबल।शुरू से अब तक आमतौर पर छोटे शहरों या उभरते महानगरों की जिंदगी देखी। टीकमगढ़, ग्वालियर, इंदौर, भोपाल, हरिद्वार, देहरादून और अब दिल्ली। टीकमगढ़ से दिल्ली तक के सफर में हर जगह एक बात समान थी, वहां महिलाएं अपने घर से निकलते समय किसी अनजाने भय के माहौल में घिरी नहीं रहती थीं। अंधेरा घिरने के पहले लौट आना उनकी आदत भले हो, मजबूरी नहीं थी। वहां के माहौल में मैंने कभी अपने को असुरक्षित महसूस नहीं किया, लेकिन दिल्ली में तो दिन भी डराते हैं और यहां रात तो महिलाओं के लिए खौफ का दूसरा नाम है। आए दिन महिलाओं से बलात्कार और अपहरण या फिर हत्या की खबरें अखबारों और चैनलों की सुर्खियां बनती रहती हैं। ऐसा नहीं कि वहां लूट-मार, छीना-झपटी या महिलाओं के प्रति बदनियती की घटनाएं नहीं होतीं, लड़कियों और औरतों की अस्मत पर घात लगाने वाले दुनिया के हर कोने में मौजूद हैं, लेकिन दिल्ली में तो ऐसे लोग बेलगाम होकर घूम रहे हैं। जब मैं इस डर के बारे में सोचती हूं तो पाती हूं कि घटनाएं-दुर्घटनाएं हर जगह होती हैं, लेकिन वहां मरहम लगाने वाले लोग होते हैं। खासकर लड़कियों के मामले में तो ऐसा होता है कि पड़ोसी की बेटी को लोग अपनी बेटी की निगाह से देखते हैं। कम से कम अपनी गली में घुसते ही सुरक्षा का अतिरिक्त भाव मन में पैदा हो जाता है, ऐसा लगता है कि अपना ही घर है। लेकिन यहां गली में घुसने के बाद भी कदमों की रफ्तार धीमी नहीं होती। पता नहीं कौन फब्तियां कस कर चला जाए। हद तो यह है कि मोहल्ले वाले तमाशबीन बनकर देखते रहेंगे। आज जब मेरा दिल्ली में रहना एक सच्चाई है, इस पूरे मामले को नए नजरिए से देखने की जरूरत महसूस करती हूं। इस उदासीनता के पीछे की वजह शायद यह है कि उन्हें पता है कि दिल्ली में रहने वाली अधिकतर कामकाजी लड़कियां दिल्ली की नहीं, बल्कि अन्य राज्यों से आई हैं। लिहाजा बगैर किसी प्रतिक्रिया के वे ऐसी घटनाओं से मुंह मोड़ लेते हैं। स्त्रियों के खिलाफ अपराध पूरी दुनिया में होते हैं। विकसित अमेरिका हो या इंग्लैंड, कोई भी इससे शून्य होने का दावा नहीं कर सकता। देश में ही जिन जगहों पर मैं रही वहां ये आंकड़े शून्य नहीं होंगे। फिर भी ऐसा क्या है जो दिल्ली को ‘असुरक्षित’ बनाता है?
Wednesday, 7 March 2012
कौन ज्यादा बीहड़ दिल्ली या चंबल?
अपनी बात की शुरुआत कहां से करूं समझ नहीं आ रहा। उस चंबल की घाटी से, जहां मैं पैदा हुई और जहां के बारे में ढ़ेरों किंवदंतियां प्रसिद्ध हैं। जहां डाकू पैदा होते हैं या फिर तिग्मांशू धूलिया की फिल्म ‘पान सिंह तोमर’ के मुख्य किरदार के मुताबिक बागी पैदा होते हैं। जहां दिन में भी जाने में डर लगता है या फिर देश की राजधानी दिल्ली से, जहां आए चार साल हो चुके हैं और जहां की जिंदगी की आदत हो गई है। जब दिल्ली में सरेआम लुट रही नारी की अस्मिता और दिन-दहाड़े लूट, कत्ल के बारे में सुनती हूं, तो सोचने को विवश हो जाती हूं कि कौन ज्यादा बीहड़ है दिल्ली या फिर चंबल।शुरू से अब तक आमतौर पर छोटे शहरों या उभरते महानगरों की जिंदगी देखी। टीकमगढ़, ग्वालियर, इंदौर, भोपाल, हरिद्वार, देहरादून और अब दिल्ली। टीकमगढ़ से दिल्ली तक के सफर में हर जगह एक बात समान थी, वहां महिलाएं अपने घर से निकलते समय किसी अनजाने भय के माहौल में घिरी नहीं रहती थीं। अंधेरा घिरने के पहले लौट आना उनकी आदत भले हो, मजबूरी नहीं थी। वहां के माहौल में मैंने कभी अपने को असुरक्षित महसूस नहीं किया, लेकिन दिल्ली में तो दिन भी डराते हैं और यहां रात तो महिलाओं के लिए खौफ का दूसरा नाम है। आए दिन महिलाओं से बलात्कार और अपहरण या फिर हत्या की खबरें अखबारों और चैनलों की सुर्खियां बनती रहती हैं। ऐसा नहीं कि वहां लूट-मार, छीना-झपटी या महिलाओं के प्रति बदनियती की घटनाएं नहीं होतीं, लड़कियों और औरतों की अस्मत पर घात लगाने वाले दुनिया के हर कोने में मौजूद हैं, लेकिन दिल्ली में तो ऐसे लोग बेलगाम होकर घूम रहे हैं। जब मैं इस डर के बारे में सोचती हूं तो पाती हूं कि घटनाएं-दुर्घटनाएं हर जगह होती हैं, लेकिन वहां मरहम लगाने वाले लोग होते हैं। खासकर लड़कियों के मामले में तो ऐसा होता है कि पड़ोसी की बेटी को लोग अपनी बेटी की निगाह से देखते हैं। कम से कम अपनी गली में घुसते ही सुरक्षा का अतिरिक्त भाव मन में पैदा हो जाता है, ऐसा लगता है कि अपना ही घर है। लेकिन यहां गली में घुसने के बाद भी कदमों की रफ्तार धीमी नहीं होती। पता नहीं कौन फब्तियां कस कर चला जाए। हद तो यह है कि मोहल्ले वाले तमाशबीन बनकर देखते रहेंगे। आज जब मेरा दिल्ली में रहना एक सच्चाई है, इस पूरे मामले को नए नजरिए से देखने की जरूरत महसूस करती हूं। इस उदासीनता के पीछे की वजह शायद यह है कि उन्हें पता है कि दिल्ली में रहने वाली अधिकतर कामकाजी लड़कियां दिल्ली की नहीं, बल्कि अन्य राज्यों से आई हैं। लिहाजा बगैर किसी प्रतिक्रिया के वे ऐसी घटनाओं से मुंह मोड़ लेते हैं। स्त्रियों के खिलाफ अपराध पूरी दुनिया में होते हैं। विकसित अमेरिका हो या इंग्लैंड, कोई भी इससे शून्य होने का दावा नहीं कर सकता। देश में ही जिन जगहों पर मैं रही वहां ये आंकड़े शून्य नहीं होंगे। फिर भी ऐसा क्या है जो दिल्ली को ‘असुरक्षित’ बनाता है?
Monday, 5 March 2012
हमें दया नहीं अपना हक चाहिए
अजीब लगता है, हम पर दया करना,
आखिर क्यों? ये भीख देते हो हमें
एक दिन हमारे सम्मान में
देते हो भाषण, करते हो वादे
कहते हो कि हमारे बिना अधूरी है दुनिया
पर सच बताओ क्या इसे महसूस करते हो तुम
रखो दिल पर हाथ और पूछो खुद से
क्या सच में देना चाहते हो हमें सम्मान?
या फिर अपने को महान बताने के लिए
ये भी तुम्हारा एक हथकंडा है
नहीं चाहिए हमें तुम्हारी दया
जानते हैं हम
हमारी क्षमता को
समय-समय पर हमने तुम्हें दिखाई है
अपनी क्षमताएं
तुमने भी माना है हमारा लोहा
पर आह पुरुष का तुम्हारा अहंकार
यह मानने से तुम्हें रोकता है
कि हमसे है तुम्हारा अस्तित्व,
हमसे जुड़ी है तुम्हारी नाभिनाल,
एक गाड़ी के दो पहिए हैं हम दोनों
फिर क्यों तुम हमें बराबर नहीं मानते
क्यों हमें वह दर्जा नहीं देते
जिसके हकदार हैं हम।
हमें दया नहीं अपना हक चाहिए
चाहिए वो स्थान
जो हमारा है और हमारा रहेगा।
Tuesday, 14 February 2012
ये काफिले यादों के कहीं खो गये होते..
उर्दू के महान शायर और ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता प्रो. कुंवर अखलाक मोहम्मद खान उर्फ शहरयार नहीं रहे। वे फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित थे, उन्होंने अंतिम सांस 13 फरवरी 2012 को रात आठ बजे अलीगढ़ में अपने निवास पर ली। सोमवार देर रात जैसे ही यह खबर टीवी पर फ्लैश हुई, तो एक पल के लिए सांसे थम सी गईं। शहरयार उर्दू के उन शायरों में शुमार हैं, जिन्होंने उर्दू शायरी को एक खासा मुकाम दिलाया। उन्होंने अपनी शायरी के माध्यम से समाज, देश की विडंबना को व्यक्त किया। शहरयार को ज्ञानपीठ सम्मान, उर्दू साहित्य में उनके योगदान के लिए दिया गया था। हिंदी फिल्मों के मशहूर अभिनेता अमिताभ बच्चन ने दिल्ली के सिरीफोर्ट अडिटोरियम में हुए 44वें ज्ञानपीठ समारोह में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान करते हुए कहा था कि शहरयार सही मायने में आम लोगों के शायर हैं।
शहरयार ने कुछ फिल्मों के गाने भी लिखे, जो बेहर मशहूर हुए। उन्होंने उमराव जान, गमन, अंजुमन जैसी फिल्मों के गीत लिखे। हालांकि वह खुद को फिल्मी शायर नहीं मानते थे और न कहलाना पसंद करते थे। उनका कहना था कि अपने दोस्त मुजफ्फर अली के खास निवेदन पर उन्होंने फिल्मों के लिए गाने लिखे हैं। यूं शहरयार चर्चा में उमराव जान में लिखी उनकी गजलों के प्रसिद्ध होने के बाद आए। अब इसे हमारे दौर की विडंबना ही कहा जाएगा कि एक बेहतरीन शायर को प्रसिद्धि फिल्मों में लिखी उसकी गजलों से मिली, जबकि वह एक लंबे समय से गजलें लिख रहे थे। बहरहाल अच्छा शायर इस शोहरत व नाम की परवाह करता तो शायद कुछ और करता शायरी न करता।
शहरयार की शायरी में मानवीय संवेदनाएं और सामाजिक स्थिति का बखूबी चित्रण मिलता है। उनकी शायरी में सियासती चालों का भी वर्णन मिलता है। बदलते वक्त के साथ कम होती मानवीय संवेदनाओं को वह कुछ यूं बयां करते हैं-
‘खून में लथ-पथ हो गये साये भी अश्जार के
कितने गहरे वार थे खुशबू की तलवार के
इक लम्बी चुप के सिवा बस्ती में क्या रह गया
कब से हम पर बन्द हैं दरवाजे इजहार के
आओ उठो कुछ करें सहरा की जानिब चलें
बैठे-बैठे थक गये साये में दिलदार के
रास्ते सूने हो गये दीवाने घर को गये
जालिम लम्बी रात की तारीकी से हार के
बिल्कुल बंजर हो गई धरती दिल के दश्त की
रुखसत कब के हो गये मौसम सारे प्यार के’
शहरयार ने शायरी की और हमारे दौर के दर्द, उदासी, खालीपन समेत अनेक चीजों को उसमें पिरोते गए। ‘इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं, जुस्तजू जिस की थी उसको तो न पाया हमने, दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिये, कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता’ जैसे गीत लिख कर हिंदी फिल्म जगत में शहरयार बेहद लोकप्रिय हुए।
देश, समाज, सियासत, प्रेम, दर्शन - इन सभी को अपनी शायरी का विषय बनाने वाले शहरयार बीसवीं सदी में उर्दू के विकास और उसके विभिन्न पड़ावों के साक्षी रहे हैं। उनकी शायरी आम लोगों की शायरी थी। शहरयार ने अपनी शायरी में उर्दू के आसान शब्दों का इस्तेमाल किया। उनका मानना था कि शायरी ऐसी होनी चाहिए, जो आम लोगों की समझ में आए। उनकी शायरी न तो कोई परचम लहराती है और न ही कोई ऐलान करती है। उनकी शायरी में एक सहजता है, जो बड़ी से बड़ी बातों को आसानी से कहने की क्षमता रखती है। उनके जाने से एक युग का अंत हुआ। महान शायर को अंतिम विदाई देते हुए बस इतना ही कहा जा सकता है-
‘ये काफ़िले यादों के कहीं खो गये होते,
इक पल अगर भूल से हम सो गये होते।’
Saturday, 11 February 2012
इतने हिंसक क्यों हो रहे हैं छात्र
गुरुवार को चेन्नई के एक स्कूल में एक छात्र ने अपनी शिक्षिका की चाकू से गोंद कर हत्या कर दी। इस खबर ने खबरिया चैनलों और अखबारों में सुर्खियां भी बटोरी। खबर में बताया गया कि छात्र शिक्षिका द्वारा अभिभावकों से उसकी शिकायत करने को लेकर नाराज था। इस खबर ने एक ओर जहां चौंका दिया, वहीं यह सोचने को भी विवश कर दिया कि आखिर इसका कारण क्या है? क्यों इस तरह की वारदातें सामने आ रही हैं? हमारे देश में जहां गुरु को गोविंद का सम्मान दिया जाता है, वहां इस तरह की घटनाएं क्या सिद्ध करती हैं?
ऐसा नहीं है कि यह केवल एक घटना हो, जिसमें छात्र ने शिक्षक के ऊपर हमला किया हो। विभिन्न स्कूलों और विश्वविद्यालयों में आए दिन ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं। इन हमलों में कई बार शिक्षक की जान भी चली जाती है। लगभग एक साल पहले भोपाल में ऐसी ही घटना हुई। छात्रों ने एक टीचर की पीट-पीट कर हत्या कर दी थी। कुछ सालों पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा एक टीचर के मुंह पर कालिख पोतने की घटना भी प्रकाश में आई थी। इसके अलावा कुछ सालों पहले सागर विश्विद्यालय के अंतर्गत एक कॉलेज में कुछ छात्रों ने परीक्षा के दौरान नकल से रोकने पर शिक्षक की धुनाई कर दी थी। विडंबना यह है कि इस तरह की घटनाएं होने के बाद भी उन पर किसी तरह की रोक नहीं लगाई जा रही है। बल्कि दिनों-दिन इस तरह के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं। पिछले कुछ सालों पर हम नजर डालें, तो छात्रों में हिंसक प्रवृत्ति ज्यादा बढ़ी है। शिक्षकों पर हमलों की बात छोड़ दें, तो अपने सहपाठियों के साथ उनका अक्रामक रूख समय-समय पर सामने आता रहता है। तकरीबन एक साल पहले ही राजधानी दिल्ली में एक छात्र ने किसी बात पर अपने सहपाठी को रिवॉल्वर से गोली मार दी थी। इसके अलावा रोजना हम अपने आस-पास भी रोज ऐसी घटनाएं देखते हैं, जहां छोटी-छोटी बातों पर छात्रों में लड़ाइयां होती हैं और कई बार वह लड़ाइयां काफी हिंसक हो जाती हैं। लेकिन बड़ी बात यह है कि आखिर ऐसे मामलों के पीछे की वजह क्या है? क्यों छात्रों के अंदर आक्रामक प्रवृत्ति बढ़ रही है?
इस मामले पर अपोलो अस्पताल की मनोवैज्ञानिक डॉक्टर अरुणा ब्रूटा कहती हैं कि ऐसे मामलों के पीछे सबसे बड़ी वजह है कि हम छात्रों का आंकलन करे बिना ही उनसे ज्यादा उम्मीदें करने लगते हैं। उनकी क्षमता क्या है, यह नहीं समझते बल्कि उन पर अपनी अपेक्षाएं लाद देते हैं, जो उनमें फ्रस्ट्रेशन पैदा कर देता है। नतीजा उनमें हिंसक प्रवृत्ति का जन्म। अरुणा कहती हैं कि इसके अलावा नैतिक मूल्य आज नहीं है। हर जगह बच्चों के अधिकार, बच्चों के अधिकार का शोर है। ऐसे में बच्चों के मन में यह घर कर जाता है कि उन्हें उनके अधिकारों से काफी कम मिल रहा है। इसके अलावा उन्हें घर या बाहर कहीं भी कोई ऐसा इंसान नहीं दिखाई देता, जिसे वो अपना रोल मॉडल बना सकें। घर पर माता-पिता का झगड़ा, स्कूल में शिक्षकों की आपसी खींचतान में उन्हें नैतिक मूल्य नहीं मिल पा रहे हैं। कहीं भी अधिकारों के साथ कर्तव्यों की बात नहीं की जा रही है। इस वजह से भी वह हिंसक हो रहे हैं और तीसरा व अहम कारण है उन्हें खुद को व्यक्त करने का मौका नहीं मिल पा रहा है। वह अपनी मौलिकता नहीं दर्शा पा रहे हैं, इस वजह से उनके अंदर तनाव, ईष्र्या और चिड़चिड़ापन आ जाता है और इस तरह की घटनाओं को वे अंजाम देते हैं।
इन कारणों से यही साबित होता है कि बच्चों के अंदर इस तरह की हिंसक प्रवृत्तियों के लिए हमारा परिवेश जिम्मेदार है। कहते हैं कि बच्चे कच्ची मिट्टी के समान होते हैं, उन्हें जैसा परिवेश दिया जाए, वही वैसे ही बन जाते हैं। इसलिए बच्चों पर दोषारोपण करने से पहले जरूरी है कि हम अपनी परवरिश और परिवेश पर ध्यान दें और उनके सामने ऐसे उदाहरण पेश करें कि वह उस जैसा बनना चाहें न कि उनके अंदर ईष्र्या और हिंसा उत्पन्न हो।
Thursday, 22 December 2011
कब पूरे होंगे उनके सपने
सपने उन्हीं के सच होते हैं, जो सपने देखते हैं। ख्वाब देखो, जिद करो और जिंदगी और दुनिया बदलो। यही है आज के युवा का मूल मंत्र। जिस पर चलकर वह साकार करता है अपने सपने और बन जाता है नं. वन। आगे बढ़ना और चलते जाना, पीछे नहीं देखना यही है आज के युवाओं का रास्ता, जिस पर वह चलते जाते हैं। कभी भी नहीं रुकना, चाहे मार्ग में कितनी बाधाएं आएं, चाहे कितनी ठोकरें लगें पर सिर्फ आगे बढ़ना। युवा पीढ़ी के बारे में भारतीय युवाओं के बारे में ऐसा ही कुछ हाल ही में आई फोर्ब्स की सूची बयां करती है।
फोर्ब्स की सूची ‘30 अंडर 30’ में दस स्थानों पर केवल भारतीय युवाओं का कब्जा है, जो हमें यह बताता है कि अगर जज्बा हो तो कुछ भी असंभव नहीं है। उद्योग, विज्ञान, चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में से भारतीय युवाओं ने यहां अपना कब्जा जमाया है और पूरे देश को दिखा दिया है कि हम किसी से कम नहीं। भारतीय मूल के नौजवानों में 17 साल के आस्टिन कालेज के छात्र और अन्वेषक परम जग्गी का भी नाम है। इन्होंने ऐल्गी से भरा एक उपकरण तैयार किया है जिसके कार की टेलपाईप पर लगाने पर यह कार्बन डायऑक्साईड को ऑक्सीजन में परिवर्तित करता है। इधर 23 साल के डैमेस्कस फॉच्यरून के मुख्य कार्यकारी विवेक नायर औद्योगिक कार्बन उत्सर्जन को कार्बन की नैनोट्यूब में बदलने की प्रौद्यागिक इजाद कर रहे हैें। वित्तीय क्षेत्र में विकास महिंद्रा को चुना गया है जो बैंक अमेरिका मेरिल लिंच में वित्तीय सलाहकार हैं। पच्चीस साल के ब्रोकर की कहानी खाकपति से लखपति बनने की है। तीन साल में उन्होंने 3.8 करोड़ डालर कमाए जिसमें 50 लाख डालर की सेवानिवृत्ति बचत योजना भी शामिल है। इनके अलावा और भी कई नाम है, जो इस सूची में शामिल किए गए हैं। यह भारत के लिए गर्व की बात है कि हमारे युवा पूरी दुनिया में अपना परचम लहरा रहे हैं और देश का नाम रोशन कर रहे हैं।
इनकी उपलब्धियां देखकर खुशी होती हैं, मगर वहीं जब कभी दिल्ली की भीड़-भाड़ वाले रास्तों पर जाती हूं और कोई चार-पांच साल का बच्चा आकर अपने हाथ फैलाता है, तो उसे देखकर यह खुशी पलभर में काफूर हो जाती है। लगता है कि क्या इनके कुछ सपने नहीं हैं। जब कभी उन्हें बारीकी से देखती हूं, तो उनकी आंखों में भी कुछ हिलता हुआ दिखता है, कुछ सपने नजर आते हैं, जो अपने सच होने के लिए एक अदद जमीन तलाश रहे होते हैं। मगर वह जमीन कहीं दिखती नहीं हैं, न नजर आता है वो रास्ता जिस पर चलकर वे अपने सपने पूरे करें। इस कड़कड़ाती ठंड में फुटपाथ पर एक पतला सा कंबल ओढ़े युवा भी नजर आते हैं, जिनके भी कुछ सपने हैं। शायद इतने बड़े नहीं, बस दो रोटी कमाने का सपना। एक छोटी सी झुग्गी का सपना, जहां वे ठंड से बच सकें। मगर उन्हें वो भी नसीब नहीं। आखिर कब पूरे होंगे उनके सपने इसका कोई जवाब कोई फोर्ब्स सूची हमें नहीं देती, कोई रिपोर्ट नहीं देती।
Monday, 10 October 2011
जाने वो कौन सा देश..
अजीब सी मिठास लिए हुए एक आवाज आज हमेशा के लिए खामोश हो गई और अपने पीछे छोड़ गई अपने प्रशंसकों और श्रोताओं की एक लंबी फौज। ऐसी फौज जो सुबह से लेकर शाम तक सिर्फ जगजीत को सुनना चाहती थी। जिसके लिए जगजीत की गजलें दवा का काम करती थी। वे हर परेशानी से बाहर निकलने के लिए जगजीत थेरेपी का इस्तेमाल करते थे। पर अफसोस यह रहा कि यह थेरेपी खुद जगजीत जी के ऊपर काम न आई। ब्रेन हैमरेज के झटके ने आखिर उन्हें हमेशा के लिए खामोश कर दिया। एक बात जो उनके प्रशंसको को और परेशान करती है वह यह है कि दूसरों के दर्द से रिश्ता बनानेोले जगजीत सिंह का खुद दर्द से बहुत ही गहरा रिश्ता था। अब ये बात समझने वाली है कि उनके श्रोता जगजीत सिंह की आवाज में अपना दर्द ढूढ़ते थे या फिर वे जगजीत जी का दर्द बांटते थे। पर फिलहाल जगजीत इन सबसे परे थे। वे गजल को साधना की तरह लेते थे और उनकी गायकी में जो मिठास थी। वह उनकी स्वभाव में भी झलकता था।
8 फरवरी 1941 को गंगानगर राजस्थान में जन्में जगजीत का बचपन का जीत था। अपने नाम के अनुरूप उन्होंने करोड़ो लोगों का दिल अपनी गायकी से जीत लिया और आगे आने वाले समय में लोगों के दिलों पर राज करते रहेंगे। उनके पिता सरदार अमर सिंह धमानी मूलत: पंजाब के रहने वाले थे। अभी दो महीने पहले सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम में जगजीत सिंह अपनी गजल ‘ठुकराओ अब तो प्यार करो में बदलाव करते हुए गा रहे थे। ठुकराओ अब तो प्यार करो मैं सत्तर का हूं।ज् उनकी इच्छा थी कि सत्तर वर्ष के हो जाने पर वो देश भर में सत्तर लाइव कंसर्ट करेंगे। लेकिन उनकी यह इच्छा अधूरी रह गई। इसका मलाल हम जसे जगजीत प्रेमियों के लिए भारी पड़ रहा है।
कहा जाता है कि हर कलाकार अपनी किसी कृति में अपने आपको रखता है। मुङो जगजीत की सबसे प्यारी गजल लगती है ‘होठों से छू लो तुमज्। उसमें एक लाइन है ‘जग ने छीना मुझसे, मुङो जो भी लगा प्यारा, सब जीत लिये मुझसे, मैं हरदम ही हाराज्। लगता है जगजीत ने ये लाइने अपने लिए ही गाई थी। जिंदगी में हर समय उन्हें हार मिलती रही। जुलाई 1990 में उन्होंने अपने बेटे को खो दिया था, जिसके बाद बहुत दिनों तक वे गजल गायकी से दूर रहें पर जब वापसी की तो श्रोताओं ने फिर से इस जादुई आवाज को सराहा। 2009 में उनकी और चित्रा जी कि पुत्री (चित्रा जी के र्पूोिह से) ने आत्महत्या कर ली। एक अनचाहे दुख ने फिर उन्हें घेर लिया, मगर उनकी गायकी में इसकी बानगी तक नजर नहीं आई। जगजीत सिंह की गजलों ने हमें भरपूर आनंद और सुख दिया, किसी को उनकी आवाज में जश्न नजर आया, तो किसी को प्यार। मगर इस गजल सम्राट की जिंदगी में कितना दु:ख है, इसे श्रोता नहीं समझ पाते थे। आज वो हमारे बीच नहीं हैं, तो उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए मैं सिर्फ यही कह सकती हूं कि ‘तुम्हें कर न सके सलाम, है दिल में रह गई बात, जल्दी से छुड़ाकर हाथ, कहां तुम चले गए...'
Sunday, 15 August 2010
हकीकत
जिंदगी यूँ ही बेकार हो गई ,
सत्य की ठोकर लगी तो पाया कुछ नहीं ,
हवा का रुख देखकर अब जिंदगी को जी,
क्योकि रुख बदलती आंधियो पर तेरा बस नहीं
दोष ओरों के सर पर दे रहे हो आप ,
घाव अपनों के कभी सीभी सके हो क्या ,
भावनाएं उनकी समझ भी सके कभी,
आंसुओ के मोती पी भी सके हो क्या,
शराफत के तराजू में तोलो खुद को देख लो ,
हवा का रुख देखकर जी भी सके हो क्या
Wednesday, 5 May 2010
जिन्दगी बहुत अजीब शब्द हैं जिन्दगी..
जिन्दगी बहुत अजीब शब्द हैं जिन्दगी
एक खुबसूरत लम्हा तो कभी बदनुमा दाग हैं जिन्दगी
हर पल यहाँ विचारों का प्रवाह हैं जिन्दगी .
कभी सकारात्मक
तो कभी नकारात्मक हैं जिन्दगी
जब सोचती हूँ जिन्दगी के बारे मैं
तो समझ नहीं पाती आखिर क्या हैं जिन्दगी.
बस एक ही बात आती हैं मन
की बहुत रहस्यमय हैं ये जिन्दगी...
Saturday, 24 April 2010
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