Monday, 20 January 2014

बड़ी प्यारी थी वो मुलाकात


हाल ही में मां की तबियत ठीक नहीं थी, तो घर जाना हुआ। उन्हें लेकर हम भोपाल जा रहे थे, तो ट्रेन में एक आठ साल के लड़के से मुलाकात हुई। सामने वाली बर्थ पर वह अपनी बड़ी मम्मी (ताई जी) के साथ बैठा था। जब हमने ट्रेन पकड़ी, तो वह सो रहा था। एक घंटे बाद उठा और बैठ गया। वह बीच-बीच में अपनी बड़ी मम्मी से कुछ कह रहा था। उसकी आवाज स्पष्ट नहीं थी। अब तक मुझे यह समझ आ गया था कि वह नॉर्मल नहीं है। उसे बोलने-देखने में समस्या है। उसकी बड़ी मम्मी ने बताया कि वह बचपन से ही अल्पविकसित है। मैंने उससे पूछा तुम्हारा नाम क्या है? तो उसने अस्पष्ट आवाज में जवाब दिया जोएल।  यहां से हमारी बातों का सिलसिला  शुरू हुआ। वह मुझसे बातें कर रहा था और मैं उससे।
सच में यह मेरा पहला अनुभव था कि अविकसित बच्चे से बात करने का। मुझसे करीब 20 साल छोटे बच्चे से  मैं बातें कर रही थी। उसने अपनी बातों और इशारों में  बताया कि वह अमृतसर से आ रहा है और घर जाना है। जब मैंने उसे खाने के लिए चिप्स दिए, तो उसने इनकार किया और बोला ‘घर अभी-अभी खाऊंगा’ मैं उसे समझने की कोशिश करने लगी। तभी वह फिर बोला ‘घर, मछली (बचपन में हम जैसे मछली को अपने दोनों हाथों से बनाकर बताते थे) फ्राई खाऊंगा।’ अब मैं समझ गई थी वह कह रहा था कि अभी नहीं घर जाना है और घर जाकर मछली को फ्राई करके वह खाएगा। उससे बातें करते हुए मैं उसे समझ रही थी। जोएल की बातें मुझे बहुत प्यारी लग रही थीं। बेहद संजीदगी से वह मेरी बातों के जवाब दे रहा था। थोड़ी ही देर में वह मेरा अच्छा दोस्त बन गया और फिर मुझे पता ही नहीं चला कि  कब भोपाल आ गया। जोएल ने न जाने मुझसे इस तीन घंटे के सफर में कितनी बातें की। जब मैं उतरने लगी, तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और कहा ‘घर...घर दीदी घर’, वह मुझसे कह रहा था कि दीदी घर चलो। मैंने उसके सिर पर हाथ फेरा और वादा किया उसके घर आने का। एक महीना हो गया इस बात को। अब पता नहीं अब कभी जोएल से मुलाकात होगी भी या नहीं। लेकिन उसकी मासूमियत से भरा चेहरा आज भी याद आ जाता है। ईश्वर उसे खूब खुश  रखे, यही कामना।      

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